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Bakse | Amisha Rajput

बक्से में रखी है मैंने, तुम्हारी दी हुई सभी चीज़े संभालकर| अलमीरा का एक कोना तुम्हारी मोहब्बत से दी हुई चीज़ो से ही सजा रखा है मैंने| बड़ी सरल सी चीज़े हैं,

कोई चाँद सितारे नहीं हैं, मगर,

अनमोल हैं, और एक अपनी ही आकाशगंगा बनाकर रखते हैं वो| तुम्हारा दिया हुआ पोस्टकार्ड भी है, जिसके शब्द पढ़ मैं मंद-मंद मुस्काती हूँ, जिसकी तस्वीर देख मैं सुध-बुध खो बैठती हूँ| मैं पूछना चाहती हूँ कि आखिर कैसे कर लेते हो ये पुराना सा इश्क़ इस नये से ज़माने में| पोस्टकार्ड हटाते ही, दिखते है मुझे वो झुमके, जो जयपुर से लाये थे तुम, मैं पहन लेती हूँ और निहारती हूँ खुद को दर्पण में, "सचमुच, ये तुम्हारा स्नेह खूब जचता है मुझ पर|" एक इतर की शीशी है, जिसमे हमारे इश्क़ की खुशबू भी मिली है, अपने बदन पर रगड़ लेती हूँ मैं उसे और कर लेती हूँ इज़हार खुद से ही तुम्हारे इश्क़ का| और अंत में उस बक्से में है, तुम्हारे अनकहे वादें और शब्द, तुम्हारी मुस्कुराहटें और तुम्हारे संग का सुकून, तुम्हारी परवाह और बिताये हुए लम्हे, और उन्ही के साथ है हमारा मृत्यु के बाद तक का सफर, जो तुमने दे दिया था मुझे तब ही, जब मेरे नैनों के ब्रह्माण्ड में खो गए थे तुम, मगर, मैंने? मगर मैंने उस दिन पा लिए था खुद को| और पा लिया था सबकुछ| By Amisha Rajput

 
 
 
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